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विशेष

युवा दिवस और युवाओं के लिए संदेश

राजीव डोगरा | January 12, 2020 08:07 AM

शिमला,

स्वामी विवेकानंद जी एक ऐसे शख्स है जिस पर सिर्फ भारत वासियों को नहीं समूची मानव जाति को उन पर गर्व है इन्होंने अपनी ओजस्वी वाणी से टूटी हुई भारतीय जनता को फिर से उठ खड़े होने के लिए प्रेरित किया। वास्तव में किसी भी युग पुरुष की जयंती मनाने का मतलब उनको सिर्फ याद करना ही नहीं होता  जयंती का मतलब है हम उनके उपदेशों को अपने जीवन में डाल कर अपने जीवन को सही ढंग से चला सकें। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने उनके बारे में कहा था- "यदि आप भारत को जानना चाहते हैं, तो विवेकानन्द को पढ़िये। उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पाएंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं।"युग-पुरुष 'स्वामी विवेकानंद' का जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता (वर्तमान में कोलकाता) में हुआ।उनका जन्म दिवस राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। विवेकानंद जी ने अपने गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस जी के दिव्य ज्ञान और उनके बताएगें सन्मार्ग पर चल कर मानव जाति के लिए बड़े-बड़े कल्याणकारी कार्य किए। विवेकानन्द जी अपने साथियों को संबोधित करते हुए कहते थे, "मनुष्य गाड़ना ही हमारे जीवन का एकमात्र उद्देश्य हो। हमारी एकमात्र साधना हो। वृथा विद्या का गर्व छोड़ दो।भले ही कोई मतवाद उत्कृष्टतम हो, हमें उस की आवश्यकता नहीं है।ईश्वर की अनुमति ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य है।श्री रामकृष्ण देव अपने जीवन में इन आदर्शों को दर्शा गए हैं हमें उनके आदर्श जीवन का ही अनुकरण करना है।"
स्वामी जी ने 11 सितंबर 1893 शिकागो में सर्वधर्म सम्मेलन में ऐसा जोरदार भाषण दिया कि जिसको सुनकर सारे विश्व में हिंदुत्व की गूंज सुनाई देने लगी और विवेकानंद जी को तूफानी हिंदू के नाम से सब जाने लगे। स्वामी जी ने शिकागो में हुई सर्व धर्म सम्मेलन में कहा था, "मनुष्य मनुष्य के बीच भेद पैदा करना धर्म का काम नहीं है।जो धर्म मनुष्य में टकराव पैदा करता है।वह कुछ सिरफिरे लोगों का निजी विचार अथवा मत हो सकता है।उसे धर्म की संज्ञा देना मनुष्य के धार्मिक विवेक का अपमान करना है।धर्म द्वंद से परे है धर्म का आधार है प्रेम,भाईचारा,सहानुभूति,दया,ममता, आत्मीयता तथा सह- अस्तित्व की भावना।"
स्वामी जी ने हमें धर्म की सही परिभाषा का ज्ञान करवाया है मगर हम उस ज्ञान को अनदेखा कर आज भी धर्म के नाम लड़ -झगड़ रहे। स्वामी जी ने भारत के मूल धर्म का परिचय देते हुए कहा है,"जिस धर्म के वह प्रतिनिधि है वह सनातन हिंदू धर्म है।समुंदर पार भारतवर्ष नाम किस धर्म की विशेषता है कि यह समूची मनुष्य जाति के लौकिक एवं अध्यात्मिक विकास का संकल्प लेकर चला है। इससे सोच की मूल भूमि मनुष्य मात्र का कल्याण है। समस्त बुराइयों का परित्याग कर समस्त अच्छाइयों की ओर पूर्वक बढ़ने का निर्देश देता है यह धर्म।विश्व के सभी धर्मों की तुलना में सनातन हिंदू धर्म सर्वाधिक प्राचीन उधार है इस धर्म में किसी तरह की संकीर्णता तथा नकारात्मकता के लिए कोई स्थान नहीं है।" जिस सनातन हिंदू धर्म को स्वामी जी ने सारे विश्व में गर्व का पात्र बनाया।उसी धर्म की आज हम खिल्ली उड़ा रहे क्योंकि जिस तरह उन्होंने धर्म की व्याख्या की उस तरह आज हम अपने धर्म को नहीं निभा रहे हैं। आज तो हम धर्म के नाम पर आपस में मार कटाई ही कर रहे।स्वामी जी को यु्वाओं से बड़ी उम्मीदें थीं।उन्होंने युवाओं की अहं की भावना को खत्म करने के उद्देश्य से कहा है 'यदि तुम स्वयं ही नेता के रूप में खड़े हो जाओगे, तो तुम्हें सहायता देने के लिए कोई भी आगे न बढ़ेगा। यदि सफल होना चाहते हो, तो पहले ‘अहं’ ही नाश कर डालो।' उन्होंने युवाओं को धैर्य, व्यवहारों में शुद्ध‍ता रखने, आपस में न लड़ने, पक्षपात न करने और हमेशा संघर्षरत् रहने का संदेश दिया।  स्वामी जी ने अपनी ओजस्वी वाणी से युवकों को जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया मगर आज हमारा युवा वर्ग स्वामी जी के उपदेशों को भूलकर अपने जीवन का अर्थ ही भूल गया है। आज युवा दिवस के अवसर पर मैं यही कहना चाहूंगा कि हमारे युवा वर्ग को जागने की जरूरत है क्योंकि जब वो जागेगा और स्वामी विवेकानंद जी के उपदेश  पर चलेगा।उस दिन हमारे भारतवर्ष का स्वरूप बिल्कुल ही बदल जाएगा। क्योंकि युवा गहन ऊर्जा और उच्च महत्वकांक्षाओं से भरे हुए होते हैं। उनकी आंखों में भविष्य के इंद्रधनुषी स्वप्न होते हैं। समाज को बेहतर बनाने और राष्ट्र के निर्माण में सर्वाधिक योगदान युवाओं का ही होता है। अंत में मैं स्वामी जी की सुप्रसिद्ध पंक्तियों से अपनी कलम को विराम देता हूं
"जिस पल मुझे यह ज्ञात हो गया कि हर मानव के हृदय में भगवान हैं तभी से मैं अपने सामने आने वाले हर व्यक्ति में ईश्वर की छवि देखने लगा हूं और उसी पल मैं हर बंधन से छूट गया। हर उस चीज से जो बंद रखती है, धूमिल हो जाती है और मैं तो आजाद हूं।" 
                                      -स्वामी विवेकानंद

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