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लोकडाउन में ज़िन्दगी......

इंद्रपाल कौर चंदेल | May 06, 2020 07:22 PM
इंद्रपाल कौर चंदेल

 

मज़े है .....आपके, घर में ऐश है!
सालो से है सुनते आये हम!
हम ने बोला.......

अब क्यों कहते हो।
कोविड-19 की सजा है।
घर में बैठे हो, तुम्हे भी तो मज़ा है!
सालो से मजबूरी में बंध हैं हम
फिर भी अपनी दुनिया,
अपने संगीत में मग्न है हम!

दो दिन क्या क़ैद हुये ...तुम
हाहाकार मच गयी।
उपरवाले के घर,
दुआओ की कतार बढ़ गयी।

आओ .....सुनाओ।
इस करोने का मजा
तुम ही बताओ फिर...
"क्या यह है सजा"....??

बच्चो के घर पर होने से,
मां की ज़िन्दगी महकी है।

बहन युनिवर्सिटी से आ गई घर।
छोटे महाराज ने खूब मचाया शोर!

पतिदेव का है वर्क फ्रॉम होम।
मगर अंताक्षरी पर है पूरा ज़ोर!

बेटे को फिरसे ड्रम्स ने पुकारा है।
एग्जाम हुए कैंसिल,
अब यही खुन्नस निकालने का ,एक मात्र सहारा है।

नयी पुरानी दोस्ती रंग लायी है।
मस्तानो की टोली ने ,
प्रभु में लग्न लगायी है।

सब पर संगीत का रंग छाया है।
दुःख -दर्द सब इस ने भुलाया है।

चिड़िया भी,
खुल कर गीत गाती है।
सितारों का,
टिमटिमाना भी नज़र आया है!

अब तुम ही ....बताओ।
क्या ......यह कोरोना है ।
या .................सज़ा है।

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