Monday, September 28, 2020
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राज्य

सिर्फ...... कान

प्रीति शर्मा असीम | September 16, 2020 03:51 PM

 

कभी -कभी लगता है.....
न हाथ है।
न पांव है।

बस सुनने के लिए। 
सिर्फ सुनने के लिए। 
बस..... सुनें जाने के लिए। 

बस कान ,
सिर्फ.... कान है।

सबकी
अपनी -अपनी,
दुनियां है।
आसपास रहने वाले,
सब अपनी....
अपनी......
दुनियां में  गुम  है।

सबके अपने रास्ते है।
सबकी अपनी मंजिलें है।

सबकी अपनी बातें है।
सबकी अपनी रायें है।

सबकी जुबानें है।
सबकी सुनता हूँ।

कभी लगता है....
बस यहीं......एक काम है।

 बस.... जो भी आता है।

 सुना कर चला जाता है। 

टटोल कर देखता हूँ।
क्या सच में.....
सिर्फ कान.....
सिर्फ कान ..........है।

 

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