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कविता

लोकतंत्र......... है

प्रीति शर्मा असीम | November 26, 2020 09:21 PM

झूठ ही चलन में है।

और हो क्या रहा है.....भारत में ।

भारतीय समाज में...व्यवहार में ।

यही तो हो रहा है ।

झूठ सब जगह
स्वीकार ,
अंगीकार ।

सच की तो मृत्यु हो चुकी है ।

और हो रही है..

.होती रहती है । ।

इस लिए तो......
उसका पता ही कहा है अब ....?

ऐसे ही मारा जाता है ।

बहुत सारे उपाय हैं ,

अलग - अलग संविधानों में ,

सत्ताओ में , और तंत्रों में .

जरूरी नहीं कि,

गैस- चैंबर ही सर्वोत्तम उपाय हो ,

या , फांसी ,या फिर , काला पानी ,

या आजीवन कारावास की सजा ही ,

दी जाए क़ाल कोठरी में . निर्भर करता है , विधान पर ,

और आपके इस्तेमाल पर ।। ।

कौन सा उपाय सही रहेगा ,

व्यवस्था तय कर लेती है ।।

पूंजीवाद है , तो आप उपभोक्ता हैं,

आपको मारने के तरीके अलग होंगे ,

जो आपकी जेब के अनुसार तय होंगे ।।

महगाई , फीस वृद्धि , बेरोजगारी ,

व्यापार में घाटा ,भूख , भुखमरी ,

गरीबी , इलाज न होना ,

फसलों का बर्बाद होना ,

ऐसा कोई भी कारण,
हो सकता है....

जरूरी नहीं कि,

आपको बताया ही जाए ।

या फिर ,आपको पता चल जाए ।

अचानक ही कारण बन जाते हैं ।

जो मरते नहीं ,
मार डाले जाते हैं ।

और अनेकों आत्महत्या से,

स्वर्ग को सिधार जाते हैं ।।

लोकतंत्र है ,

तब फिर दूसरे उपाय अपनाए जायेंगे , जल्दबाजी बिल्कुल नहीं होगी ,

आप वोटर हैं ,

काफी छूटो के हकदार होंगे ,

आपकी आर्थिक क्षमता और व्यवहार के अनुसार ,

मौत स्वयं तय हो जाएगी ।।

किसी गैस कांड में , या फिर अग्नि दुर्घटना में , अस्पताल में ,

बीमारी से, या फिर लाचारी से , दंगे में या फिर कर्फ्यू में हाथरस में ,

या फिर भागलपुर में , भोपाल में , या फिर जालंधर में ,

कोई न कोई तरीका बन जाएगा ,

आपका क्रिया - कर्म हो जाएगा.

इस लिए ,मृत्यु नही जीवन समस्या है।

पर इस की नहीं कोई व्यवस्था है ।

किसी भी तंत्र में , संविधान में , या फिर ,

विश्व में या विश्व स्वास्थ संगठन के विधान में , इस हैवानियत भरे दौर,

राज और संसार में ।।।।।

 
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