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राज्य

बायोफ्लॉक तकनीक से कम लागत में बढ़ेगा मछली पालन, बढ़ेगी कमाई

हिमालयन अपडेट ब्यूरो | November 30, 2020 04:40 PM
ऊना,
 
समय के साथ बदलती प्रौद्योगिकी किसानों को हर क्षेत्र में लाभान्वित कर रही है। मिसाल के लिए मछली पालन के क्षेत्र में अब आधुनिक तकनीक अपनाकर, कम पानी और कम ख़र्च में अधिक उत्पादन से बेहतर कमाई की जा सकती है। आधुनिक तकनीक बायोफ्लॉक से कम पानी और कम खर्च में अधिक मछली उत्पादन संभव है। बायोफ्लॉक तकनीक मछली पालन का आधुनिकतम वैज्ञानिक तरीका है। 
ध्यात्व है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आत्मनिर्भर भारत पैकेज के तहत मछली पालन को बढ़ावा देने के लिए 20 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। पीएम मत्स्य संपदा योजना के तहत केंद्र सरकार मछली पालन के लिए गुणवत्ता वाली प्रजातियों की नस्ल तैयार करने, बुनियादी ढांचे के विकास तथा मार्केटिंग आदि के लिए सब्सिडी के रूप में आर्थिक सहायता प्रदान करती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस योजना का शुभारंभ 10 सितंबर, 2020 को किया था।
बायोफ्लॉक तकनीक के तहत मछली पालन को पीएम मत्स्य संपदा योजना के तहत लाया गया है, ताकि किसान कम जगह और पानी में आधुनिक तकनीक की मदद से कम ख़र्च में अधिक कमाई कर सकें। तालाब बनाकर भी सघन मछली पालन संभव नहीं है, जबकि बायोफ्लॉक तकनीक में पानी का इस्तेमाल भी कम होता है और मछली के चारे की बचत भी काफी होती है; क्योंकि तकनीक के माध्यम से मछलियों के अप्शिष्ट को पानी के अंदर ही फिर से प्रोटीन के रुप में बदल दिया जाता है। यानी कम खर्च में अधिक मुनाफा।
पीएम मत्स्य संपदा योजना के तहत बायोफ्लॉक तकनीक के अलावा रिसर्कुलर एक्वॉकल्चर सिस्टम (आरएएस) को भी कवर किया गया है। इस सिस्टम को अपनाकर कम क्षेत्र में मछली उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है। इस तकनीक में पानी के बहाव की निरंतरता को बनाए रखने के लिए पानी के आने-जाने की व्यवस्था की जाती है। बायोफ्लॉक तथा आरएएस के तहत किसानों को छोटे टैंकों का निर्माण करना होता है तथा टैंकों की क्षमता के मुताबिक इसे तीन श्रेणियों में बांटा गया है, जिनकी लागत 7.5 लाख रुपए से लेकर 50 लाख रुपए तक हो सकती है। सरकार इस पर 40 से 60 प्रतिशत तक सब्सिडी प्रदान करती है। तकनीक आधारित मछली पालन अपनाकर एक बार में 4 से लेकर 40 टन तक मछली उत्पादन किया जा सकता है। 
 
 
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