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हिमाचल

हस्तशिल्प का चितेरा डोलाराम

November 24, 2018 06:08 PM

 

रामपुर बुशहर,

अंतर्राष्ट्रीय लवी मेले का पुरातन स्वरूप बेशक दिनों दिन बदल रहा है लेकिन हस्तशिल्प के कदरदानों के लिए एक बाजार आज भी मेला स्थल के समीप सजता है। इस बाजार में मंदिरों में उपयोग होने वाले पारंपारिक वाद्ध् यत्रों से लेकर मूर्तियां और पूजा में काम आने वाले सामानों की खूब मांग रहती है। समय के साथ साथ हस्तशिल्प के कारीगरों की आमद भी कम हो रही है लेकिन हस्तशिल्प का चितेरा कुल्लू जिले के शाड़ाबाई गांव का निवासी डोलाराम आज भी अपनी अनूठी कलाकृतियों के साथ अपने पूर्वजों से चली आ रही परंपरा को निभा रहा है।

डोलाराम को यह कला अपने पूर्वजों से बिरासत में मिली है हालांकि उसने किसी प्रकार का तकनीकी प्रशिक्षण नहीं लिया है फिर भी सिर्फ चेहरा देखकर उसे सांचे में ढालना वह खूब जानता है। देवी देवताओं की मूर्तियां हो या ढोल नगारे, नरसिंघे, करनाल, छत्र, कावली, बाणा आदि डोलाराम के सधे हुए कुशल हाथ उन्हें एक अलग ही पहचान देते हैं। कुल्लू, मंडी, किन्नौर, शिमला जिलों में शायद ही कोई ऐसा मंदिर हो जहां पर डोलाराम का कोई न कोई हस्त निर्मित सामान उपयोग में न आता हो। छोटे से गांव की छोटी सी कार्यशाला में उपरोक्त सामान बनाने का काम पूरे तौर पर हस्त निर्मित होता है मात्र छैनी हथोड़े की सहायता से डोलाराम के कुशल हाथ धातु के टुकड़े को मनचाहा आकार दे देते हैं किसी प्रकार की मशीन का उपयोग नहीं किया जाता है।

सामान्य रूप से उसके हस्तनिर्मित उत्पाद की कीमत साढ़े तीन हजार से लेकर 40 हजार तक होती है। अंतर्राष्ट्रीय लवी मेले के मौके पर प्रदेश भर से आए हस्तशिल्कार अपने अपने हस्तशिल्प का प्रदर्शन करते हैं लेकिन पिछले 12 साल से हस्तशिल्प के पहले पुरस्कार पर डोलाराम कब्जा जमाए हुए है। इस बार भी प्रदेश के मुख्यमंत्री जैराम ठाकुर ने उसे हस्तशिल्प का पहला पुरस्कार पाने पर सम्मानित किया।

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