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विशेष

शुभ मुहूर्त में करें करवाचौथ व्रत का पूजन

पंडित मोहिंद्र शर्मा | October 16, 2019 09:48 AM

 

शिमला में 17 अक्तूबर गुरुवार को चंद्रोदय रात करीब 8 बजकर 11 मिनट पर होंगा।

शिमला,
करवाचौथ का व्रत कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को किया जाता है l इस वर्ष करवाचौथ का व्रत 17 अक्तूबर गुरुवार को है ।
करवाचौथ का उपवास सुहागन स्त्रियों के लिए बहुत अधिक विशेष महत्व रखता है। इस दिन सुहागन महिलाएं अपने पति की उम्र लंबी की प्रार्थना करती हैं और उनका गृहस्थ जीवन सुखद रहे इसके लिए व्रत करती हैं। पूरे भारत में हर त्योहार को धूमधाम से मनाया जाता है लेकिन उत्तर भारत खासकर हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा,राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश आदि में तो इस त्योहार की अलग ही रौनक देखने को मिलती है। चांद देखने के बाद ही महिलाएं अपना व्रत खोलती हैं। इस दिन कुंवारी कन्याएं जिनकी स़गाई हो गई हो वह भी व्रत रखती हैं ।

सुहागिन महिलायें अपने सुहाग की रक्षा के लिए उपवास रखने के बाद आसमान के चमकते चांद का दिदार कर अपने पति के हाथों से निवाला खाकर अपना उपवास खोलती हैं। करवाचौथ का व्रत सुबह सूर्योदय से पहले ही 4 बजे के बाद शुरु हो जाता है और रात को चंद्रदर्शन के बाद ही व्रत को खोला जाता है। इस दिन श्रीगणेश,भगवान शिव, माता पार्वती,स्वामी कार्तिकेय और चंद्रदेव की पूजा की जाती है और करवाचौथ व्रत की कथा सुनी जाती है।

सामान्यत: विवाह के बाद 12 या 16 साल तक लगातार इस उपवास को किया जाता है लेकिन इच्छानुसार जीवनभर भी विवाहिताएं इस व्रत को रख सकती हैं। अपने पति की लंबी उम्र के लिये इससे श्रेष्ठ कोई उपवास अथवा व्रत आदि नहीं है। इस दिन महिलाएं श्रृंगार करके पूजा करने जाती हैं और फिर आकर घर के बड़ों का आशीर्वाद लेती हैं। महिलाओं में ये त्योहार बहुत ही प्रचलित होता है।

चतुर्थी तिथि कब शुरू होगी-:-

चतुर्थी तिथि का आरंभ 17 अक्तूबर
को सुबह 6 बजकर 49 से शुरु होगी और चतुर्थी तिथि की समाप्ति 18 अक्तूबर
सुबह 7 बजकर 28 मिनट को होगी।

करवाचौथ पूजन का शुभ मुहूर्त एवं उद्यापन के लिए 17 अक्तूबर पूरा दिन शुभ है लेकिन चंद्रोदय के समय और भी शुभ रहेगा।

चंद्रदर्शन का समय इस प्रकार है :-

शिमला में 17 अक्तूबर गुरुवार को चंद्रदर्शन रात करीब 8 बजकर 11 मिनट पर होंगे।

करवाचौथ व्रत कैसे शुरू करें :-

करवा चौथ व्रत के दिन व्रती सुबह जल्दी उठ कर शुद्ध जल से स्नान करें घर में पूजा स्थान या घर में कोई पवित्र स्थान में गंगाजल का अभिषेक कर के शुद्ध आसान पर बैठ कर आत्म पूजा कर,कर यह संकल्प करें ” मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये करक चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये” संकल्प बोलकर करवा चौथ के व्रत को शुरू करे।

पूजन के बाद क्या करें -

इस दिन सुबह उषाकाल पूजन कर सबसे पहले कुछ खाना तथा पीना चाहिए । उत्तर भारत उषाकाल से पहले सरगी में फैनी,कतलमे, नारियल, दूध, रबड़ी, मीठी कचौरी का खाने प्रचलन है। इस मिश्रण के सेवन से पूरे दिन बिना पानी पीये रहने में मदद मिलती है।

करवाचौथ पूजन व्रत विधि :-

शाम 5 बजकर 47 मिंट से 7 बजकर 22 के बीच दीवार पर गेरू से फलक बनाकर पिसे चावलों के घोल से करवा चित्रित करें,नहीं तो आज कल मार्किट से भी चित्र मिलते हैं। आठ पूरियों की अठावरी बनाएं। मीठा और साथ में अलग-अलग तरह के पकवान बनाये,गौरी को लकड़ी के आसन पर बिठाएं,बिंदी आदि सुहाग सामग्री से गौरी मैया का श्रृंगार करें,जल से भरा हुआ लोटा रखें करवा में गेहूं और ढक्कन में शक्कर का बूरा भर दें रोली से करवा पर स्वस्तिक बनाएं श्री गणेश, शिव, स्वामी कार्तिकेय, और चंद्रदेव और चित्रितकरवा की विधि अनुसार पूजा करें।

पति की लंबी आयु की कामना करें और इस मंत्र का जाप करे ”ऊॅ नम: शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संतति शुभाम। प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे॥”

‘ॐ शिवायै नमः‘ से पार्वती का, ‘ॐ नमः शिवाय‘ से शिव का, ‘ॐ षण्मुखाय नमः‘ से स्वामी कार्तिकेय का, ‘ॐ गणेशाय नमः‘ से गणेश का तथा ‘ॐ सोमाय नमः‘ से चंद्रमा का पूजन करें।

करवा पर 13 बिंदी रखें और गेहूं या चावल के 13 दाने हाथ में लेकर करवा चौथ की कथा खुद करें या सुनें कथा सुनने के बाद करवा पर हाथ घुमाकर अपने सास ससुर सभी बड़ो का आशीर्वाद ले और करवा उन्हें दे दे,तेरह दाने गेहूं के और पानी का लोटा अलग रख लें रात्रि में चन्द्रमा निकलने के बाद छलनी की ओट से उसे देखें और चन्द्रमा को अर्घ्य दें यानि उन्हें जल चढ़ाये और उनकी लंबी आयु की कामना करे और जिंदगी भर आपका साथ बना रहे इसकी कामना करे इसके बाद पति के पैरों को छुए और उन से आशीर्वाद लें और उनके हाथ से जल पीएं उन्हें भोजन कराएं और स्वयं भी भोजन कर लें। उद्यापन में भी पुरोहित को बुलाकर पूजन एवं कथा श्रवण कर 13 सुहागिन स्त्रियों की पूजा विधि उन्हें सुहागियां दान करें ।

करवा चौथ की पूजन सामग्री इस प्रकार है :-

शुद्ध मिट्टी, चॉदी, सोने या पीतल आदि किसी भी धातु का टोंटीदार करवा व ढक्कन,देसी घी का दीपक, रुई गेहूँ, शक्कर का बूरा, हल्दी, पानी का लोटा, कुंकुम, शहद, महावर, कंघा, बिंदी, चुनरी, चूड़ी, बिछुआ, दूप,अगरबत्ती, पुष्प, कच्चा दूध, शक्कर, शुद्ध घी, दही, नारियल,मेंहदी, मिठाई, गंगाजल, चंदन, चावल, सिन्दूर, गौरी बनाने के लिए पीली मिट्टी, लकड़ी का आसन, हलुआ, छलनी, आठ पूरियों की अठावरी,फूल माला श्रद्धा स्वरुप दान के लिए दक्षिणा वस्त्र इत्यादि ।

इस दिन महिलाएं सोलह श्रृंगारकरना चाहिए वह इस प्रकार है :-

इस दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं। सोलह श्रृंगार में माथे पर लंबी सिंदूर अवश्य हो क्योंकि यह पति की लंबी उम्र का प्रतीक है। मंगलसूत्र, मांग टीका, बिंदिया ,काजल, नथनी, कर्णफूल, मेहंदी, कंगन, लाल रंग की चुनरी, बिछिया, पायल, कमरबंद, अंगूठी, बाजूबंद और गजरा ये 16 श्रृंगार में आते हैं।

यह व्रत 12 वर्ष तक अथवा 16 वर्ष तक लगातार हर वर्ष किया जाता है। अवधि पूरी होने के पश्चात इस व्रत का उद्यापन (उपसंहार) किया जाता है। जो सुहागिन स्त्रियाँ आजीवन रखना चाहें वे जीवनभर इस व्रत को कर सकती हैं।

करवाचौथ व्रत कथा :-

महाभारत काल माना जाता है। इसी व्रत के प्रभाव से पाण्डव विजयी हुए। द्रौपदी का सौभाग्य सुरक्षित रहा। सर्वप्रथम इस व्रत को श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को बताया था। महाभारत काल में एकबार अजरुन नीलगिरी पर्वत पर तपस्या करने गए। द्रौपदी ने सोचा कि यहां हर समय जीव-जंतु सहित विघ्न-बाधाएं रहती हैं। उसके शमन के लिए अजरुन तो यहां नहीं हैं। यह सोचकर द्रौपदी ने भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान किया और अपने कष्टों का निवारण पूछा। उन्होंने करवाचौथ के बारे द्रौपदी को बताया था ।

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