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विविध जाति , धर्म और संप्रदायों के देश भारत की राजनीति को समझना इतना आसान नहीं : हेमराज ठाकुर

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हेमराज ठाकुर | June 07, 2024 10:15 AM

अनेकता में एकता की क्षमता रखने वाले विविध जाति , धर्म और संप्रदायों के देश भारत की राजनीति को समझना इतना आसान नहीं है जितना आम तौर पर सोचा जाता है। इसी राजनैतिक समझाइश के चलते भारत के सभी राजनैतिक दलों ने 2024-2029 का चुनावी खेल मई - जून 2024 में लड़ा। राष्ट्रीय पार्टियों ने राष्ट्र स्तर पर तो क्षेत्रीय पार्टियों ने अपने - अपने क्षेत्रों या राज्यों में लड़ा। इस चुनाव में अधिकतर राजनैतिक दल दो मुख्य राजनैतिक संयुक्त घटकों में लड़े ,जिसमे इंडिया गठबंधन को 234 तो एनडीए गठबंधन को 292 सीटें प्राप्त हुई। दोनों दलों ने चुनाव के बीच अपने - अपने दावे पेश किए । इंडिया गठबंधन ने 295 सीट आने का अनुमान लगाया था तो एनडीए गठबंधन ने अबकी बार 400 पार का नारा बुलन्द किया । चुनावी प्रक्रिया का सातवां चरण 1 जून 2024 को शाम 6 बजे जैसे ही समाप्त हुआ तो इधर इलेक्ट्रानिक मीडिया और सोशल मीडिया भी अपना एक्जिट पोल घोषित करने में लग गया। हर टी वी चैनल में इस मुहिम की भरमार सी मची । एग्जिट पोल में अधिकतर सीटें एनडीए गठबंधन को जाती दिखाई गई। इसमें तो इन्हें सच में 400 पर सीटें ही आती बताई जाने लगी। इससे इण्डिया गठबन्धन के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने एक बार फिर से पूर्व की भांति ईवीएम मशीनों में गड़बड़ होने की सम्भावना जताना शुरू कर दी। इतना ही नहीं इससे दलों के सामान्य कार्यकर्ताओं में भी खासा उत्साह और आक्रोश सा फैल गया। देश के हर गांव,कस्बे और शहर में लोग अपने अपने विचार के गठबन्धन के पक्ष में बहस करते दिखाई दिए। पर कहते हैं न कि क्रिकेट की गेम का और राजनीति के खेल का कोई पता नहीं चलता कि कब क्या हो जाए? कभी भी बाजी पलट सकती है। बस सारी बात शॉट लगने पर निर्भर है। चुनाव के परिणाम जैसे ही 4 जून को शाम होते - होते घोषित हुए तो वे सच में चौंकाने वाले आए। इन परिणामों के बाद सभी की बहस का विषय भी बदल गया।इसी के साथ ईवीएम मशीनों में गड़बड़ी का मामला भी ठंडे बस्ते में चला गया। महत्वपूर्ण अगर कुछ हुआ तो वह यह था कि भाजपा को इतना नुकसान यदि हुआ तो क्यों हुआ और इतनी ऐंटी इनकंबैंसी के चलते भी इण्डिया गठबन्धन पूर्ण बहुमत के आंकड़े को क्यों नहीं छू सका? इस बहस में प्रधान मंत्री मोदी जी की लोकप्रियता और राहुल गांधी की कड़ी मेहनत के नतीजों पर भी चर्चा शुरू हुई । इण्डिया गठबन्धन का दावा है कि इस चुनाव में प्रधान मंत्री मोदी जी की लोक प्रियता काम हुई है तो इण्डिया गठबन्धन से राहुल जी की मेहनत रंग लाई है। इस पूरी लड़ाई में ममता,अखिलेश,नीतीश और नायडू बड़े चेहरे के रूप में उभर कर सामने आए। खैर यह तो राजनैतिक गलियारों की अपनी चकाचौंध है। हम यदि निष्पक्ष और राष्ट्रीय स्तर पर इस चुनाव की समीक्षा करें तो कहना न होगा कि इस चुनाव में राष्ट्रीय पार्टियों का वजूद घटा है और क्षेत्रीय पार्टियों का वजूद बढ़ा है। इसका कारण भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि जनता ने जाति और धर्म को आधार बनाकर अपने - अपने मतों का प्रयोग किया। इण्डिया गठबन्धन ने जातिगत जनगणना और संविधान के खतरे में पड़ने के मुद्दे को लोकतन्त्र की रक्षा के लिए प्रमुखता से उठाया तो एनडीए ने धार्मिक पृष्ट भूमि और राष्ट्रीयता पर ज्यादा जोर दिया। ऐसे में जनता ने अपने सरोकारों को ध्यान में रखते हुए इण्डिया गठबन्धन के आरक्षण बचाने के मुद्दे को अधिक महत्व दिया शायद, जो यूपी जैसे राज्य में इण्डिया की झोली में अच्छा खासा बहुमत आ गया। कई राज्यों में कुछ राजनैतिक दलों के व्यक्तिगत वजूदों ने अपने - अपने क्षेत्रीय वैचारिक मुद्दों पर साख की लड़ाई के चलते बढ़त हासिल की जो दोनों राजनैतिक घटकों के पक्षों में लगभग बराबर - बराबर जाती दिखाई दी। इस पूरी प्रक्रिया में विचार का और चिन्तन का यह विषय है कि राष्ट्रीय पार्टियों ने अपना अस्तित्व क्यों और कैसे कमजोर किया? क्योंकि क्षेत्रीय दलों की कामयाबी से कहीं ज्यादा राष्ट्र हित में राष्ट्रीय दलों के वजूद का कायम रहना बहुत जरूरी है। राष्ट्रीय दलों का पक्ष - विपक्ष में सशक्त होना वैश्विक राजनैतिक घटनाक्रम के लिए अत्यावशक है। यह बात जरूर है कि क्षेत्रीय दल हमारी क्षेत्रीय समस्याओं के हिसाब से अधिक फायदेमंद होंगे पर अंतराष्ट्रीय धरातल पर जितनी महत्वपूर्ण भूमिका राष्ट्रीय दलों द्वारा निभाई जाएगी उतनी क्षेत्रीय दल नहीं निभा पाएंगे। क्षेत्रीय दलों के सक्रिय होने से राष्ट्र की आर्थिक सहायता का भी समान विभाजन नहीं हो पाएगा जिससे सम्पूर्ण राष्ट्र का समग्र विकास भी तो नहीं हो पाएगा। इससे भ्रष्टाचार और अन्य सामाजिक विघटनों को भी ताकत मिलने की अधिक सम्भावना रहती है। क्योंकि कुछ राज्य संतुष्ट और कुछ असंतुष्ट होंगे। इससे तो असंतुलन फैलेगा ही फैलेगा। परन्तु सवाल यह भी खड़ा होता है कि राष्ट्रीय दलों को आगे बढ़ने से किसने रोका? वे करे कुछ ऐसा कि जनता उनसे ज्यादा से ज्यादा जुड़े। राष्ट्रीय पार्टियों की लोकप्रियता के घटने के पीछे के कारणों पर जब समाज में चर्चा - परिचर्चा की जाए तो निष्कर्ष यह निकलता है कि राष्ट्रीय दलों में अपनी ताकतों पर जरूरत से ज्यादा अहम आ गया है जिसके चलते वे अपनी पार्टी के आखिरी कार्यकर्ता तक अपना तालमेल नहीं बिठा पा रही है, जिससे युवा पीढ़ी के तथा पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं में मनमुटाव होने के चलते राष्ट्रीय पार्टियों को राष्ट्रव्यापी संगठन होने के बाद भी अन्दर घात से हर बार अच्छा खासा नुकसान होता है। ये गुटवाजियां और वजूद की कलह है तो क्षेत्रीय दलों में भी पर राष्ट्रीय दलों को इस पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। क्योंकि आज जहां देश के सामने जातिवाद, धर्मवाद, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, शिक्षा ,स्वास्थ्य, न्याय ,नीति और अराजकता के साथ - साथ ड्रग माफियाओं से निपटने की आंतरिक चुनौतियां हैं वहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कंपीट करने की एक विकट चुनौती भी है। इन सभी से क्षेत्रीय घटकों के चलते नहीं निपटा जा सकता । इन मुद्दों से निपटने के लिए कड़े फैसले लेने पड़ते हैं और वह तभी सम्भव होगा जब राष्ट्रीय दल पूर्ण बहुमत से सरकार बनाकर संसद में बैठेगा। राष्ट्रीय पार्टियों को नुकसान उनके वैचारिक अनुसांगिक संगठनों की अनदेखी से भी हो रहा है । बड़ी जीत के लिए अपनी टीम का बड़ा होना भी जरूरी है और उसके लिए सभी को जोड़ कर रखना मजबूरी है। पंतुन यहां देखा जा रहा है कि कांग्रेस का वैचारिक धरातल पर अनुसांगिक संगठन " सेवादल " कांग्रेस पार्टी में आज इस महत्व का नहीं रह गया है,जितना वह पहले होता था। ठीक इसी तर्ज पर भारतीय जनता पार्टी में इसके वैचारिक संगठन " राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ" के बारे में भी कुछ ऐसा ही धीरे - धीरे होने लगा है। यह बात भी सच है कि जब ये राष्ट्रीय पार्टियां अपने इन वैचारिक अनुसांगिक संगठनों को अधिक महत्व देने लगेगी तो इनके अपने पार्टी के कार्यकर्ता नाराज होंगे और यह भी सच है कि यदि ये पार्टियां अपने इन मूल वैचारिक संगठनों को तवाजों न देगी तो तब भी पीटेगी। ऐसे में फायदा हमेशा क्षेत्रीय दलों को ही होगा। क्योंकि यह तो सत्य है कि ये अनुसांगिक संगठन सामाजिक और सांस्कृतिक होते हैं और ये राष्ट्रीय पार्टियों के जिस धड़े के साथ खड़े होते हैं,उसके सिवा दूसरे किसी धड़े को वोट नहीं करते। हां नया दल खड़ा कर सकते हैं या क्षेत्रीय दलों को सहयोग कर लेते हैं। देखा यह भी गया है कि इन संगठनों के अलावा हर राजनैतिक संगठन के अपने पार्टी के आम कार्यकर्ता को भी उस दल के सत्ता पर बैठने के बाद कोई खास महत्व नहीं मिलता,जिससे वह रूष्ट हो कर अपनी पार्टी बदल लेता है और उस दल को नुकसान होता है। यह इसलिए होता है क्योंकि चुनावों में मेहनत तो कोई और ही कार्यकर्ता करते हैं और सत्ता में आने पर नेताओं को कुछ खास लोग हाईजैक कर लेते हैं तथा पांच साल में वे हाईजैकर तो अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं पर पांच साल बाद उस दल और दल के नेता को आम कार्यकर्ता के आक्रोश का भागी बना देते हैं। पार्टियां बदलने वाले पार्टियों के अपने ही असंतुष्ट कार्यकर्ता होते हैं न कि उन पार्टियों को सहयोग करने वाले वैचारिक अनुसांगिक संगठन। संगठन की अपनी एक कार्यशैली होती है और अपनी एक ताकत होती है । ये सभी निस्वार्थ भाव से अपने पैसों और सेवाओं से अपना संगठन चलाते हैं और अपनी - अपनी विचारधारा के राजनैतिक दल का समर्थन करते हैं। पर जब वह राजनैतिक दल सत्ता में आने पर अहम में आ कर इन वैचारिक संगठनों की अनदेखी करता है तो मुंह की खानी पड़ती है।नेता समय के साथ समाप्त हो जाता है पर संगठन और पार्टियां निरंतर रहते हैं। इसलिए व्यक्ति से बड़ा संगठन होता है। इस बात को सभी राष्ट्रीय दलों को याद रखना चाहिए। दूसरा अपनी पार्टी स्तर पर भी अपने नए और पुराने कार्यकर्ताओं की बराबर पूछ - पहचान सभी दलों को रखनी चाहिए। अन्यथा नुकसान झेलना होगा। पुराने लोगों ने पार्टी खड़ी की होती है और नए लोगों का होना या जुड़ना भी पार्टी के उत्थान के लिए बहुत जरूरी होता है। इन मुद्दों को ध्यान में रखते हुए किसी की अनदेखी किए बिना जो पार्टी सभी में तालमेल बिठाने और सत्ता में आने पर सभी को महत्व देने में कामयाब होगी, भविष्य में वही बचेगी । बाकी सब समय की धारा के साथ बह जाएंगे। ऐसा नहीं है कि किसी भी राजनैतिक दल का नीचे तक कोई संगठनात्मक ढांचा नहीं है। है भी और काम भी करता है। समस्या गुटवाजियों की है और नए पुराने कार्यकर्ताओं की अनदेखी तथा संगठन के आखिरी पंक्ति के कार्यकर्ता की अनदेखी की है। सामान्य कार्यकर्ता तो बस इतना सा ही चाहता है कि उसकी पार्टी वाले उसे भी हर बैठक में बुलाए और उसे भी मान - सम्मान मिले। उसे भी बूथ स्तर के निर्णयों के बारे में पूछे। जब कोई सामान्य कार्यकर्ता वर्षों से किसी पार्टी से जुड़ा रहता है,उसे वोट भी देता है और स्पोर्ट भी करता है तब उसकी यह उम्मीद रखना भी वाजिब है। फिर भी उसको झण्डा और डंडा उठाने तक के काबिल भी नहीं समझा जाता या बूथ स्तर के अधिकारी उसे कोई खास तवजो ही नहीं देते। तवजो तो दूर की बात किसी कार्यक्रम की सूचना तक नहीं देते तो वह निराश हो कर एक पार्टी को छोड़ कर दूसरी पार्टी का दामन थाम लेता है। वह अपने दो चार मित्रों को भी धीरे - धीरे साथ ले जाता है। नुकसान उसके पूर्व दल को होता है। परन्तु जो अनुसांगिक संगठनों के कार्यकर्ता किसी राजनीतिक पार्टी को स्पोर्ट करते हैं,वे इस प्रकार से पाला कभी नहीं बदलते । भले ही वे नाराज होकर अपना वोट नोटा को ही क्यों न डाल दें। इसलिए आज हर राष्ट्रीय राजनैतिक दलों को अपने वैचारिक ,सामाजिक और राजनीतिक अनुसांगिक संगठनों के महत्व को समझना होगा। पार्टी संगठन के साथ - साथ इन संगठनों को भी सत्ता में आने पर प्रमुखता से महत्व देना होगा। तभी ये संगठन चुनावों के समय और उसके आगे पीछे भी अपनी विचारधारा के राजनैतिक संगठन का प्रचार - प्रसार जनता में करेंगे। क्योंकि ये संगठन सामाजिक और सांस्कृतिक होते हैं और पार्टी का अपना संगठन विशुद्ध राजनैतिक होता है जिसके वरिष्ठ से वरिष्ठ कार्यकर्ता भी निजी स्वार्थ के चलते पार्टी कभी भी बदल सकते हैं। पार्टी संगठन में भी नए - पुराने कार्यकर्ता को बराबर महत्व सत्ता पर आने के बाद भी और सत्ता से बाहर रहते भी देना होगा। मात्र और मात्र चुनावों के समय ही बातचीत करने से कुछ भी नहीं होगा ।पार्टी की मजबूती के लिए हर राष्ट्रीय पार्टी के स्थानीय विधायक और अन्य नेताओं को सत्ता में रहते और सत्ता से बाहर रहते भी निरन्तर बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं से बैठके करते रहना होगा ताकि वह उनका हौसला बढ़ाए रखने और उनका मनोबल बढ़ाने के साथ - साथ अपना परिचय भी उनके बीच अधिक से अधिक करवाए। आज की राजनीति में तो वोटर भी नेता से व्यक्तिगत बातचीत और पहचान की अपेक्षा करता है जो भविष्य में राजनेताओं को करना भी होगा। जब कोई नेता जीत कर सत्ता में आता है तो वह अपना बजट भी सभी कार्यकर्ताओं को विश्वास में ले कर आवंटित करे। मात्र अपने कुछ खास पदाधिकारियों के कहने पर बांटे,जैसा कि अधिकतर देखा जाता है।अन्यथा मुंह की खानी पड़ेगी। इस प्रकार कहा यही जा सकता है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का लोहा मनवाने के लिए राष्ट्रीय राजनैतिक दलों को महत्व देना होगा और उन दलों को अपने पुराने वैचारिक अनुसांगिक दलों को विशेष महत्व अपनी पार्टी के संगठन के साथ देना होगा। यही राष्ट्र हित और समाज हित में सर्वोपरि है। अन्यथा हम छोटे - छोटे राजनैतिक घटक दलों में बंट कर देश के सर्वांगीण विकास और अंतर्राष्ट्रीय राजनैतिक पैंतरे को कमजोर कर बैठेंगे। 

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